:
Breaking News

इतिहास के पन्नों से: 500 साल पुराना ‘वैष्णव जन तो’ भजन कैसे बना गांधी की प्रार्थना का स्वर

top-news
https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | ‘वैष्णव जन तो’ भजन का इतिहास करीब पांच शताब्दियों पुराना है। जानिए संत कवि नरसिंह मेहता की रचना कैसे महात्मा गांधी की प्रार्थना और स्वतंत्रता आंदोलन की पहचान बनी।

नई दिल्ली, 2 अक्टूबर आलम की खबर: “वैष्णव जन तो तेने कहिए...” की शुरुआती पंक्तियां सुनते ही महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं, आश्रम और स्वतंत्रता आंदोलन की तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है। लेकिन इस भजन की कहानी गांधी से कहीं पहले शुरू हो चुकी थी। इसकी जड़ें 15वीं शताब्दी के गुजरात में मिलती हैं, जहां संत कवि नरसिंह मेहता ने इसे रचा था। लगभग पांच सौ वर्ष बाद यही रचना गांधी के आश्रम जीवन और सार्वजनिक प्रार्थना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।

नरसिंह मेहता की रचना का मूल संदेश किसी धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं था। भजन में ऐसे व्यक्ति के गुणों का वर्णन मिलता है जो दूसरे के दुख को अपना दुख समझे, किसी के साथ अहंकार न करे, संयम रखे और मानवता को व्यवहार में उतारे। यही नैतिक संदेश बाद में गांधी के सामाजिक और आध्यात्मिक विचारों के साथ गहराई से जुड़ता दिखाई दिया।

गुजरात की लोक परंपरा से निकली थी इसकी धुन

‘वैष्णव जन तो’ का शुरुआती संबंध सौराष्ट्र की लोक परंपरा ‘दायरो’ से बताया जाता है। दायरो केवल गीत-संगीत का आयोजन नहीं था, बल्कि लोककथाओं, आध्यात्मिक विचारों, संवाद और सामुदायिक मनोरंजन का भी माध्यम था। ऐसे आयोजनों में भजनों को अपेक्षाकृत सरल लोक शैली में प्रस्तुत किया जाता था।

इसी वजह से यह रचना भारी संगीत संयोजन पर निर्भर नहीं थी। एकतारा, मंजीरा और सामूहिक गायन जैसी सहज परंपराओं ने इसे आम लोगों तक पहुंचाने में भूमिका निभाई। बाद में जब यह गांधी के आश्रमों की प्रार्थना परंपरा में आई तो इसकी प्रस्तुति का स्वरूप भी बदला और इसे अधिक व्यवस्थित संगीत शैली में गाया जाने लगा। शोध के अनुसार बाद के दौर में इसे राग आधारित स्वरूप देने का काम भी हुआ।

गांधी को क्यों पसंद आया यह भजन?

गांधी के लिए भजन केवल धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा नहीं था। उनकी प्रार्थना सभाओं में अलग-अलग धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रचनाएं शामिल होती थीं। संगीत के माध्यम से आत्मिक अनुशासन, सामूहिकता और नैतिक चेतना को मजबूत करने की उनकी सोच के साथ ‘वैष्णव जन तो’ का संदेश स्वाभाविक रूप से मेल खाता था।

भजन का केंद्रीय विचार था कि सच्चा वैष्णव वही है जो दूसरे व्यक्ति के दर्द को समझे और उसके प्रति संवेदनशील रहे। गांधी के सार्वजनिक जीवन में सत्य, अहिंसा, सेवा और सामाजिक बराबरी जैसे विचारों को महत्वपूर्ण स्थान मिला। इसलिए इस भजन की पंक्तियां उनके आश्रम जीवन और प्रार्थना सभाओं में विशेष अर्थ ग्रहण करती गईं।

गांधी की मां पुतलीबाई धार्मिक वातावरण में रहने वाली महिला थीं और गांधी के बचपन का माहौल भी वैष्णव परंपराओं से प्रभावित था। हालांकि यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि उन्होंने बचपन में यह भजन अपनी मां से ही पहली बार सुना था। उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री से इतना स्पष्ट है कि दक्षिण अफ्रीका में गांधी के सामुदायिक जीवन में सामूहिक प्रार्थना और भजन गायन का महत्व बढ़ा और बाद में भारत लौटने के बाद यह परंपरा उनके आश्रमों में और व्यवस्थित हुई।

दक्षिण अफ्रीका के अनुभव से भारत के आश्रमों तक

गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान फीनिक्स सेटलमेंट जैसे सामुदायिक प्रयोगों में सामूहिक प्रार्थना महत्वपूर्ण थी। वहां अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि के लोगों के साथ प्रार्थना और भजन की परंपरा विकसित हुई। संगीत को समुदाय को जोड़ने वाले माध्यम के रूप में देखने का गांधी का अनुभव इसी दौर में मजबूत हुआ।

भारत लौटने के बाद जब गांधी ने आश्रम जीवन को व्यवस्थित रूप दिया, तब प्रार्थना सभाएं उनके दैनिक कार्यक्रम का अहम हिस्सा बन गईं। ‘वैष्णव जन तो’ धीरे-धीरे इन सभाओं की पहचान बनने लगा। गांधी के आश्रम में इस भजन की नियमित प्रस्तुति ने इसे गुजरात की सीमा से बाहर पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई।

दांडी मार्च के दौरान बना जनआंदोलन का स्वर

साल 1930 का दांडी मार्च ‘वैष्णव जन तो’ की लोकप्रियता के इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। नमक कानून के विरोध में गांधी के नेतृत्व में निकली लगभग 250 मील लंबी यात्रा के दौरान भजन और प्रार्थना गीत आंदोलन के सामूहिक वातावरण का हिस्सा बने। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार यात्रा की शुरुआत के समय नारायण खरे ने ‘वैष्णव जन तो’ गाया और मार्च के दौरान भी यह भजन गांधी और उनके साथियों के बीच गूंजता रहा।

इस तरह एक क्षेत्रीय भाषा में 15वीं शताब्दी में लिखी गई भक्ति रचना 20वीं शताब्दी के स्वतंत्रता आंदोलन में नैतिक संदेश देने वाले गीत के रूप में सामने आई। गांधी की प्रार्थना सभाओं में इसके नियमित गायन ने इसकी पहचान को और मजबूत किया।

जेल में भी गूंजा था गांधी का पसंदीदा भजन

‘वैष्णव जन तो’ गांधी के जीवन में इतना महत्वपूर्ण हो चुका था कि उनके जेल प्रवास के दौरान भी यह प्रार्थना का हिस्सा बना। 1932 में यरवदा जेल में गांधी के उपवास टूटने के अवसर पर हुई प्रार्थना सभा में भी यह भजन गाया गया था। उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज इसे गांधी के पसंदीदा भजनों में शामिल करते हैं।

यहां इसकी खासियत सिर्फ धार्मिक भावना नहीं थी। भजन में दूसरे के दुख को समझने और उसके प्रति संवेदना रखने की बात गांधी के सार्वजनिक संदेश से जुड़ती थी। यही कारण है कि समय के साथ इसकी पहचान किसी एक संप्रदाय या क्षेत्र की रचना से आगे बढ़कर मानवीय मूल्यों से जुड़े गीत के रूप में बनी।

आज भी गांधी की पहचान से जुड़ा है ‘वैष्णव जन तो’

आज ‘वैष्णव जन तो’ को महात्मा गांधी की प्रार्थना परंपरा से अलग करके देखना मुश्किल है। हालांकि रचना के मूल लेखक गांधी नहीं थे। इसके रचयिता 15वीं शताब्दी के संत कवि नरसिंह मेहता थे। गांधी ने इस पुराने गुजराती भजन को अपने आश्रमों, प्रार्थना सभाओं और सार्वजनिक जीवन में जिस स्थान पर पहुंचाया, उससे यह पूरे देश में व्यापक रूप से पहचाना जाने लगा।

यही इस भजन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक यात्रा है—गुजरात की लोक परंपरा से निकली एक रचना, जो सदियों का सफर तय कर गांधी की प्रार्थना सभाओं तक पहुंची और फिर स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों के साथ भारतीय जनमानस का हिस्सा बन गई।

यह भी पढ़ें

रोसड़ा में 50 साल पुरानी महात्मा गांधी की प्रतिमा तोड़ी गई, आक्रोशित लोगों ने हाईवे जाम कर जताया विरोध

आलम की खबर पर प्रकाशित यह रिपोर्ट रोसड़ा में महात्मा गांधी की प्रतिमा से जुड़े हालिया घटनाक्रम की जानकारी देती है।

विचार

‘वैष्णव जन तो’ की विरासत यह बताती है कि किसी रचना की शक्ति केवल उसके लिखे जाने के समय में नहीं होती। शब्द और संगीत जब समाज के नैतिक मूल्यों से जुड़ते हैं तो वे पीढ़ियों का सफर तय कर सकते हैं। नरसिंह मेहता की सदियों पुरानी रचना का गांधी के जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ना भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसमें भक्ति, लोक परंपरा और सामाजिक संवेदना एक साथ दिखाई देती है।

https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *